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इर्तिका अयूब स्वयं में एक रग्बी प्लेयर हैं, जो कि कश्मीर की रहने वाली हैं। इर्तिका अयूब का इस बारे में कहना है कि इन्होंने रग्बी को अपने पसंदीदा खेल के तौर पर इसलिए चुना है क्योंकि इसकी तेज़ गति ताक़त और ख़ून के बहाव को तेज़ करने के लिए और उसको बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार होती है। समझने वाली बात है कि जब रग्बी आपके हाथ में होती है तो तब आप गोल की ओर दौड़ते हो, ऐसे में वह ग़ज़ब की फुर्ती और सक्रियता को जन्म देने का काम करता है।
इन्हीं सब सोच और इरादों के साथ रूढ़िवादी समाज और पारिवारिक दबाव के बावजूद इर्तिका अयूब रग्बी खेलती रहीं, लेकिन एक बार जब खेल के दौरान इनकी नाक टूट गयी तो इनका जमकर विरोध किया गया और ने महीनों तक मानसिक तनाव के गहरे गर्त में चली गयीं। हालाँकि तब इनके पिता इर्तिका की उम्मीद बनकर खड़े हुए और इन्हें संभाला। ऐसे में इर्तिका अयूब ने अपनी हिम्मत नहीं छोड़ी और वापस रग्बी से प्रेम ज़ाहिर किया और ये अकेले की वहाँ लड़कियों की कोचिंग करने लगीं।
इर्तिका बताती हैं कि कश्मीर घाटी में खिलाड़ी लड़कियों की पहली मुश्किल पारिवारिक बंदिशों का लांघना ही एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में साफ़ है कि इन वर्जनाओं को तोड़कर कश्मीर घाटी की लड़कियों को रग्बी के लिए न सिर्फ़ प्रेरित करना बल्कि उन्हें विधिवत प्रशिक्षण देना कितनी चुनौती भरा काम है। यक़ीनन इर्शिका ने वो कर दिखाया है। दिलचस्प है कि इर्तिका अयूब को उनके बेहतरीन खेल के चलते जम्मू-कश्मीर की सबसे कम उम्र की रग्बी विकास अधिकारी (आरडीओ) बनाया गया है।
Author: Amit Rajpoot
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